Tuesday, 5 July 2011

वह बात जो शब्दों में नही कही जा सकती थी...

शब्दों  के जादूगर ने रचाया ऐसा तिलिस्म
कि
हो गया सब काया कल्प
पेड़ पौधे हो गए छू मंतर
दिन घंटे युग बह गए नदी बन कर
बहने लगे साथ ही  प्रतिबद्धताओं के तिनके
धूएं के बादल बन गए  वचन 
और निष्कर्ष के मसौदे की  चिन्दियाँ फंस गई चक्रवात में  
औरत का दिल कबूतर बन कर 
मापने लगा आसमान
आसमान जो कभी भी समंदर कि देह धारण कर सकता था 

तब 
वह बात जो शब्दों में नही कही जा सकती थी
चुपचाप जा बैठी सन्नाटे की कोख में 
उस आकार की प्रतीक्षा में
जो 
इस काया कल्प की परिधि से परे हो
शाश्वत हो !

इस खतरनाक जादुई माहौल  में वह अपने  प्यार का इज़हार कैसे करती ?

- लीना मल्होत्रा.

22 comments:

Raj said...

विश्वास के हाथ की
पाँचो उंगलियाँ पञ्चगव्य हैं
वंचना की दोहरी दृष्टि
जिव्ह्या है तक्षक की-
स्नेह में-
जो भी परीक्षित हो
अपने को पावन करे
विष से –
नहीं तो मरे |

Vimlesh Tripathi said...

धूएं के बादल बन गए वचन
और निष्कर्ष के मसौदे की चिन्दियाँ फंस गई चक्रवात में
औरत का दिल कबूतर बन कर
मापने लगा आसमान
आसमान जो कभी भी समंदर कि देह धारण कर सकता था

आप लिखें..खूब लिखें...बहुत अच्छा लिखती हैं आप..ढेर सारी बधाईयां और शुभकामनाएं...

Anonymous said...

हवा सनसनाती हुई बहती रही ...
देह में रिसते हुए दुःख को छू कर,
कहीं किसी खुशबू की याद निशब्द...
सोखती रही मन की गुहाओं से
पीड़ा की अनुगूंज...
पूरे आकाश में एक ही पक्षी की बोली
मेरे होने को देती रही विराटता का आधार...
कहती रही हवा, खुशबू, पाखी की आवाज...
वह बात जो शब्दों में नहीं कही जा सकती थी...

Travel Trade Service said...

इंसानी भावनाओं ....और उनका मर्म इन्सान कई बार आपनी मोजुदगी को या तो शाश्वत होने देता है या सिमित परिधि की निष्ठाओं में बंधा होता है वही उस पल में आकर अपनी जिब्वाहा को सिल देता है पर इस चक्रव्यू ...को भावनाएं तोड़ देती है ...और शब्दों का बांध टूट पड़ता है .....जादू बिखरने लगता है .....अब वो मोन या आखों से भी हो सकता है .......कोमल अहसासों से भरी सुंदर शाब्दिक अभिव्यक्ति जी !!!!!!!!!!!!!!!!Nirmal Paneri

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अच्छी कविता. शिल्प आकर्षक और कथ्य प्राणवान..

Vivek Jain said...

बहुत हे सुंदर अभिव्यक्ति, सुंदर शब्द चयन,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Vipul said...

sunder rachna. abhivyakti me jaadu hai. bohat sunder.

mahendra srivastava said...

बहुत बढिया।
आभार

S.N SHUKLA said...

khoobsurat post, badhayi.

संजीव said...

सन्नाटे की कोख से निकले शब्‍दों में भाव गहरे हैं.

anju said...

stree purush ke jaadu me fans hee jaati hai... yah uske jeevan ka shaashvat katu satya hai. ek sundar abhivyakti ke liye badhai.

प्रवीण पाण्डेय said...

कई नम निवेदन इस तड़क भड़क में सकुचाये रहते हैं। बड़ी सुन्दर कविता।

Vinay said...

I am amazed...........perhaps after many years met a poetess who could express in such a transparent powerful way.
Regards and thanks
Vinay

Anonymous said...

शब्द खड़े सकुचाते रह गये, संकेतोँ ने क्या कह डाला।

शिवानन्द said...

@ANJU पुरुष मन स्वान सम है री सखी! चल, छल करेँ! दुत्कार देँ, पुच्कार देँ . . . . देखो तो कैसे मुह उठाये पूँछ कंपित कर है आतुर।

अजेय said...

असल बात शायद शब्दों में कही ही नहीं जा सकती

C.L.C.............. said...

एक अच्छी अभिव्यक्ति/

संजय भास्कर said...

तब वह बात जो शब्दों में नही कही जा सकती थीचुपचाप जा बैठी सन्नाटे की कोख में उस आकार की प्रतीक्षा मेंजो इस काया कल्प की परिधि से परे होशाश्वत हो !
बहुत अच्छा लिखती हैं आप.....शुभकामनाएं

masoomshayer said...

बहुत बहुत खूबसूरत अंदाज़ और कविता

मान को आराम सा मिला पढ़ कर

anil parashar

masoomshayer said...
This comment has been removed by the author.
पुरुषोत्तम पाण्डेय said...

लीना जी ,
बहुत अच्छी रचनाये कर रही हैं आप.साधुबाद.

Dr.Nidhi Tandon said...

तब
वह बात जो शब्दों में नही कही जा सकती थी
चुपचाप जा बैठी सन्नाटे की कोख में
उस आकार की प्रतीक्षा में
जो
इस काया कल्प की परिधि से परे हो
शाश्वत हो !

इस खतरनाक जादुई माहौल में वह अपने प्यार का इज़हार कैसे करती ?
सच ही है प्यार के इज़हार के लिए भी तो सही माहौल चाहिए.