Sunday, 7 August 2011

मैं आई थी

मैंने तुम्हे देखा

किताबे बिखरी थी 
कुछ आधे लिखे पन्ने फाड़ कर फेंक दिए गए थे 
पेन खुला पड़ा था 
और बेसुध सोए हुए थे तुम
कुर्सी पर सर टिका था ...

बिना आहट और अधिकार के घुस आई हूँ मैं 
बची हुई चाय  प्याले में से उलट दी है और गंध और  स्पर्श  को बचा लिया है 
धुले  हुए  प्याले को  अभिवादन के लिए तैयार बैठा पाओगे  प्लेट पर 
सिगरेट की ऐश ट्रे की राख उड़ा दी है
और
धूएँ के सब गुनाह माफ़ करके उसे मुक्त कर दिया है 
सुबह तक  एक चिनार का पेड़ उगा मिलेगा उसमे

पागल दीवारों पर लिपटे हुए सब जाले और सिरफिरी धूल को पोंछ  दिया है. 

तुम्हारी खिड़की से जो  लाल गुलाब झांक रहा था 
उसे सहला कर 
समझा दिया है उपेक्षित महसूस न करे 
तुम व्यस्त हो...
बिस्तर पर कुछ सिलवटें बिखेर दी हैं 
धुली हुई चादर अलमारी से निकाल कर पैताने रख दी है 
और अलमारी में बंद कर दी हैं अलग अलग रंगों की  शुभ कामनाएं 
ठीक तुम्हारे कपड़ो के बराबर में 
वह इंतज़ार कर रही हैं...

न जाने कल तुम कौन सा रंग चुनोगे?