Thursday, 28 July 2011

धुन

नहीं
मै नही दिखाना  चाहती अपने घाव  हरे भरे
तुम्हारी  सहानुभूति  नही चाहिए मुझे
मैं जानती हूँ  तुम  मुझे मलहम लगाने के बहाने आओगे
और
उत्खनन करोगे  मेरे आत्मसम्मान की रक्त्कोशिकाओ का

मै तो बजना चाहती हूँ बांसुरी सी
 कींचल के पेड़  की तरह जो अपने ही सूराखो से बज उठता  है हवा के गुजरने पर
अपने ही ज़ख्मो से छेड़ देता है एक धुन मीठी दर्द भरी.

पेपरवेट में बंद  हवा जैसे सपने कैद हैं मेरी स्मृति में
जिन्हें मुक्त नही किया जा  सकता मुझे तोड़े बिना

कई बार ऐसे अपरिचित बादल बरस जाते हैं जो मेरे आकाश के  नही थे
उन्हें भटका के ले आया था  मेरा  ही संकल्प
 उनकी बारिश में खुशबु पा लेती हूँ तुम्हारे नाम की

तुम नही समझते जब तुम्हारा नाम किसी और के मुहं  से सुन  लेती हूँ
तो ये किसी प्रगाढ़ मिलन  से कम नही होता

और जख्मो का जिंदा रहना  तब और भी ज़रूरी हो जाता है
जो हर दम मुझे अहसास करते हैं
मरी नहीं हूँ मैं
मरे  नहीं हो तुम
जिंदा हैं दोनों इस दुनिया के किन्ही  अलग अलग कोनो में
अपने अपने झरनों के समीप
मुस्कुराते हुए  बह रहे हैं सागर में शेष हो जाने के लिए..

-लीना   मल्होत्रा