Friday, 15 July 2011

ओ गोली वाले ..बम वाले

उनमे से कोई स्त्री
उसने पकाई थी तुअर की दाल और रोटी
शायद फिर कभी न बना पाए वो दाल
वो सोचेगी ये दाल मनहूस है

उसने पहनी होगी पीली धोती
सोचेगी पीला रंग मनहूस है

वह नही छोड़ने आई थी
पति को द्वार तक
उसने सोचा था रोज़ ही तो जाता है
उतनी देर में वह बच्चे का दूध गरम कर लेगी
उतनी देर में वह दुआ भी तो मांग सकती थी
उसने क्यों नही कहा इश्वर अंग संग रहना
उसने क्यों नही माँगा कि वह फिसल कर गिर पड़ती
उसका हाथ पैर या बाजू टूट जाती
वह रह जाता घर पर ही उसकी सुश्रुषा के लिए
उसने क्यों कहा था घर जल्दी आना
शाम को घूमने  चलेंगे
वह न कहती तो शायद वह अगली ट्रेन से आता

उसने क्यों न पहने  मंगल के कुसुम बालो में
उसने क्यों नही फ़ोन उठाया उस दिन
क्यों वह रूठ गई छोटी सी बात पर

अभी लाश लेने जाना है
जाने कौन सा हाथ टूटा होगा
जिससे पहली बार उसने ढकी थी उसकी आँखे और वह उसके स्पर्श में खो गई थी 
या फिर पैर जिससे उसने घूमे थे उसके साथ सात फेरे
साबुत होगा क्या उसका सर
जिसमे रहती थी सारी चिंताए प्यार और फ़िक्र
क्या पूरी होंगी वो आँखे
देख पाएगी अपनी छवि अंतिम बार उन आँखों में

ओ गोली वाले , बम वाले

तेरा उत्सव तो ख़त्म हो गया बस एक शाम में
उसकी शामे ही ख़त्म हो गई

बहुत से लोग मर गए
अनेक ज़ख़्मी हुए
जो घर में थे वो बुत में बदल गए ..

लेकिन जबकि तुम यह सोचते हो गोलीवाले  तुमने किया है 
उसका यह मानना है  कि वह खुद ही ज़िम्मेदार  है 
तो इस तरह तो जाने अनजाने वह तुम्हारी ही सहयात्रिणी हो गई है 
उसके जीवन की इस अंतिम यात्रा में जो अनंतकाल तक चलेगी

तेरा एक आंसू 
क्या तुम  नही बहाओगे  गोली वाले ...

--लीना मल्होत्रा