Tuesday, 5 July 2011

वह बात जो शब्दों में नही कही जा सकती थी...

शब्दों  के जादूगर ने रचाया ऐसा तिलिस्म
कि
हो गया सब काया कल्प
पेड़ पौधे हो गए छू मंतर
दिन घंटे युग बह गए नदी बन कर
बहने लगे साथ ही  प्रतिबद्धताओं के तिनके
धूएं के बादल बन गए  वचन 
और निष्कर्ष के मसौदे की  चिन्दियाँ फंस गई चक्रवात में  
औरत का दिल कबूतर बन कर 
मापने लगा आसमान
आसमान जो कभी भी समंदर कि देह धारण कर सकता था 

तब 
वह बात जो शब्दों में नही कही जा सकती थी
चुपचाप जा बैठी सन्नाटे की कोख में 
उस आकार की प्रतीक्षा में
जो 
इस काया कल्प की परिधि से परे हो
शाश्वत हो !

इस खतरनाक जादुई माहौल  में वह अपने  प्यार का इज़हार कैसे करती ?

- लीना मल्होत्रा.